छत्तीसगढ़

सोनिया गांधी को चुनौती! कांग्रेस अध्यक्ष पद की रेस से बाहर गहलोत? CM पद पर भी खतरा

नईदिल्ली I जीवन में महत्वाकांक्षी होना अच्छी बात है, लेकिन हद से अधिक महत्वाकांक्षा खतरनाक हो सकती है. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को जल्द ही इस बात का एहसास हो सकता है, क्योंकि कांग्रेस आलाकमान उनकी चुनौतियों और चालाकीपूर्ण अनैतिक खेलों पर रोक लगाने के लिए अपने रुख में बदलाव करता दिख रहा है. मुख्यमंत्री के रूप में तीसरी बार सेवा करने वाले सत्तर वर्षीय नेता अशोक गहलोत के लिए सब कुछ ठीक चल रहा था. वह 24 साल बाद गैर गांधी परिवार से कांग्रेस अध्यक्ष बनने की कगार पर थे. कांग्रेस में उन्हें गांधी परिवार की पसंद बताया गया. गांधी परिवार से मिले आशीर्वाद को देखते हुए उनका चुनाव महज एक औपचारिकता होती.

हालांकि, सत्ता के लिए अशोक गहलोत का लालच अब उनकी साख और किए कराए पर पानी फेर सकता है, क्योंकि उन्हें कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व करने के अवसर से वंचित किया जा सकता है. साथ ही मुख्यमंत्री पद से भी हटाया जा सकता है.

गहलोत को सीएम पद प्रिय

अशोक गहलोत के लिए मुख्यमंत्री का पद कितना प्रिय है, यह किसी से छिपा नहीं है. अपने गृह राज्य में एक नए नेता को आगे बढ़ने से रोकने और पार्टी पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए वे मुख्यमंत्री की कुर्सी से चिपके रहना चाहते थे. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए सीएम पद पर बने रहने का विचार रखा. राहुल गांधी ने यह कहते हुए इसे तुरंत खारिज कर दिया कि उनकी पार्टी एक व्यक्ति एक पद के नियम के लिए प्रतिबद्ध है.

आर्म-ट्विस्टिंग वाली रणनीति

हालांकि अपने घोर प्रतिद्वंद्वी और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट को राजस्थान के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने से रोकने के लिए गहलोत ने अपनी ताकत दिखाने का नाटक किया. कांग्रेस के 108 में से करीब 90 विधायकों ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा बुलाई गई विधायक दल की बैठक का बहिष्कार किया. कांग्रेसी विधायकों ने बड़ी संख्या में न केवल विधायक दल की बैठक का बहिष्कार किया, बल्कि उन्होंने इसके समानांतर बैठक भी की और सामूहिक रूप से विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी को विधानसभा से इस्तीफा देने की आर्म-ट्विस्टिंग वाली रणनीति में शामिल हो गए.

विधानसभा चुनाव में पायलट ने की थी मेहनत

गहलोत का उत्तराधिकारी नामित करने के लिहाज से पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को अधिकृत करने के लिए बुलाई गई इस बैठक का एजेंडा सिर्फ विधायक दल के निर्धारित पैटर्न का पालन करना था. खुद गहलोत को 2018 में इसका फायदा मिला था, क्योंकि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री पद के लिए सचिन पायलट की जगह उन्हें नामित किया था. हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर पायलट ने बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए कड़ी मेहनत की थी. तब सीएम पद के असली दावेदार के रूप में पायलट को देखा जा रहा था. हालांकि, गहलोत को इसलिए तरजीह दी गई क्योंकि उन्हें गांधी परिवार का करीबी माना जाता था.

सोनिया गांधी को दी चुनौती

सत्ता के लिए अशोक गहलोत हाईकमान से टकरा गए. अपने स्पष्टीकरण के बावजूद वे किसी को भी यह समझाने में विफल रहे कि इसमें उनका कोई हाथ नहीं था. राजस्थान के प्रभारी महासचिव अजय माकन के साथ पार्टी के दिग्गज नेता मल्लिकार्जुन खड़गे प्रदेश की राजधानी जयपुर गए. दोनों नेताओं ने सोमवार को सोनिया गांधी को सूचना दी और इसे हितों का टकराव बताया. यह कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद गहलोत को अपना ही उत्तराधिकारी नामित करने की अनुमति देने जैसा है.

सोनिया गांधी की वजह से मिली थी कुर्सी

अशोक गहलोत का सियासी वर्चस्व गांधी परिवार से उनकी निकटता के कारण है. गांधी भाई-बहनों राहुल और प्रियंका गांधी की अवहेलना करने के बावजूद, उनकी मां सोनिया गांधी से अपनी निकटता के कारण ही वे अतीत में राजस्थान के मुख्यमंत्री के पद से हटाए जाने से बच गए. हालांकि इस बार सभी सीमाओं को तोड़ते हुए उन्होंने सोनिया गांधी की सत्ता को चुनौती दी है.

पार्टी अध्यक्ष पद की रेस से बाहर?

गांधी परिवार के करीबी के तौर पर देखे जाने और साथ ही सोनिया गांधी को ललकारने का उनका स्मार्ट खेल अब उन्हें महंगा पड़ सकता है. इस प्रक्रिया के दौरान असल में गहलोत ने खुद को पार्टी के शीर्ष पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है.

गांधी परिवार से माफी मांगें गहलोत

अब गहलोत के पास एक ही विकल्प बचा है कि वे पीछे हटें, अपने समर्थकों को गांधी परिवार की पसंद सचिन पायलट को अपने नए नेता के तौर पर स्वीकार करने के लिए राजी करें. यह दावा करने के बजाय कि राजस्थान ड्रामा में उनका कोई हाथ नहीं है, सफाई दें और गांधी परिवार से माफी मांगें.

चौबे चले छब्बे बनने, दूबे बनकर लौटे

अति-महत्वाकांक्षी होने के बुरे नतीजों के बारे में एक पुरानी हिंदी कहावत है, चौबे चले छब्बे बनने, दूबे बनकर लौटे. अगर गांधी परिवार अब अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटाने और पार्टी का नेतृत्व करने के लिए किसी और को अपनी पसंद के रूप में चुनने का फैसला करता है, तो वह न घर के रहेंगे न घाट के और इसके लिए वह खुद ही जिम्मेदार होंगे.