नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने गुरुवार को जारी एक अंतरिम आदेश में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्र में होने वाले उपचुनावों में तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों को पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी.
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और विधानसभा में मौजूदा नेता प्रतिपक्ष रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दोनों गुटों से कहा कि वे शुक्रवार सुबह 11 बजे तक उपचुनाव के लिए अपने-अपने गुटों के वैकल्पिक नाम और चुनाव चिह्न के प्रस्ताव जमा करें.
कांग्रेस ने कहा कि चुनाव आयोग का यह क़दम भारतीय लोकतंत्र के दिल में गोली दागने की तरह है.
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “चुनाव आयोग ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह बीजेपी के हाथों की कठपुतली के अलावा कुछ नहीं है. चुनाव आयोग लोकतंत्र को धीरे-धीरे ख़त्म करने का एक औजार बन गया. उसने शिवसेना, एनसीपी और अब टीएमसी के मामले में भी यही किया है. जो भी बीजेपी का विरोध करता है, उस पर घातक वार किया जाता है और उसका पूरा चुनावी अस्तित्व छीन लिया जाता है.”
चुनाव आयोग के इस फ़ैसले पर ‘बैटलग्राउंड बंगाल’ के लेखक और कोलकाता के ज़ेवियर कॉलेज में पत्रकारिता के अध्यापक सायंतन घोष ने लिखा है, ”मेरे विचार में निर्वाचन आयोग की ओर से टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज किया जाना पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं था.”
‘संगठन से जुड़े ऐसे विवादों में आयोग पहले भी इसी तरह का रुख़ अपनाता रहा है. बड़ा मुद्दा यह है कि इस स्तर पर आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को टीएमसी के रूप में मान्यता देने से इनकार किया है, जबकि ममता बनर्जी पार्टी की संस्थापक-अध्यक्ष हैं.”
”यह ममता की टीएमसी के लिए एक बड़ा झटका है. हो सकता है कि उन्हें इसकी आशंका रही हो, लेकिन जिस पार्टी की स्थापना उन्होंने ख़ुद की, उसकी पहचान और चुनाव चिह्न खोना बंगाल के लिए एक असाधारण राजनीतिक घटनाक्रम है. यह तथ्य कि जिसने पार्टी बनाई उसे ही मान्यता के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, बंगाल के चुनावी इतिहास में ये अभूतपूर्व है.”

इस साल मई महीने में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद ममता बनर्जी की पार्टी में टूट फूट शुरू हो गई थी
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग का यह आदेश गुरुवार को दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों की निर्वाचन आयोग के सामने हुई सुनवाई के बाद आया. पाँच दिनों से भी कम समय में यह दूसरी सुनवाई थी. निर्वाचन आयोग ने इससे पहले 12 सितंबर को भी दोनों पक्षों को सुनवाई के लिए बुलाया था. रितब्रत गुट से कुछ अतिरिक्त दस्तावेज़ भी जमा करने को कहा गया था.




