आख़िरकार कंपनी मामलों के पंचाट यानी एनसीएलटी ने ज़ी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के मामले में यू टर्न ले लिया.
एनसीएलटी की पाँच सदस्यों वाली बेंच ने 22 हज़ार करोड़ के कर्ज़ के सामने साढ़े छह करोड़ के भुगतान को मंज़ूरी देने वाले अपने ही सदस्य के फ़ैसले पर रोक लगा दी है.
हालाँकि ट्राइब्यूनल के फ़ैसले में ये भी कहा गया है कि ऐसा कोई फ़ैसला हुआ ही नहीं था.
इस बात के समर्थन में उनका तर्क है कि पहले दो सदस्यों की बेंच में इस मामले पर एक राय नहीं हो पाई और फिर बेंच में जोड़े गए तीसरे सदस्य ने जो फ़ैसला सुनाया, उसे बेंच का या एनसीएलटी का आदेश नहीं माना जा सकता.
तीसरे सदस्य नीलेश शर्मा के फ़ैसले के अनुसार सुभाष चंद्रा के साढ़े छह करोड़ रुपए के भुगतान के प्रस्ताव को माना जा सकता था.
साथ ही उनकी सिफ़ारिश थी कि इस विचार के साथ यह मामला फिर मूल बेंच के सामने सुनवाई के लिए रखा जाए.
लेकिन अब इस किस्से पर ही रोक लग गई है और साथ ही इस मामले के लिए ख़ास तौर पर बनी पाँच सदस्यों वाली बेंच ने सुभाष चंद्रा के संपत्ति बेचने या ट्रांसफ़र करने पर रोक भी लगा दी है.
साफ़ दिख रहा है कि देश भर में इस मामले पर मचा हंगामा असर कर रहा है.
22 हज़ार करोड़ रुपए के कर्ज़ की गारंटी देने वाले सुभाष चंद्रा सिर्फ़ साढ़े छह करोड़ रुपए चुकाकर छुट्टी पा जाएँगे, यह सुनकर बवाल होना स्वाभाविक ही था.
मामला पेश तो यूँ ही हो रहा था कि सुभाष चंद्रा ने 22 हज़ार करोड़ रुपए का कर्ज़ लिया और अब उसे हजम करके सिर्फ़ साढ़े छह करोड़ देकर छुटकारा पाना चाहते हैं.
एनसीएलटी ने इस प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी यह बात सुनकर लोगों का ग़ुस्सा और भड़क उठा.
गारंटी देने वाले थे सुभाष चंद्रा
इस मामले में एक पेंच भी है. जिन कंपनियों के कर्ज़ की सुभाष चंद्रा ने गारंटी दी थी और लेनदारों की लिस्ट में बहुत से बड़े लेनदार, जिन्होंने सुभाष चंद्रा के साढ़े छह करोड़ के भुगतान की स्कीम को मंज़ूर किया, यह दोनों ही सुभाष चंद्रा के समूह से या उनके परिवार से जुड़े हुए हैं. बात सिर्फ़ इस मामले की ही नहीं है.
इसने यह सवाल एक बार उठा दिया है कि आख़िर एक के बाद एक सरकारें कैसे बड़े व्यापारियों और उद्योगपतियों के कर्ज़ माफ़ करती जाती हैं, जबकि आम आदमी को छोटे छोटे कर्ज़ों के लिए बैंक और फ़ाइनेंस कंपनियों के गुंडे धमकाया करते हैं.
हालाँकि सुभाष चंद्रा का मामला ख़ुद अपना कर्ज़ माफ़ करवाने का नहीं, बल्कि गारंटी देने वाले से कर्ज़ वसूली का है. लेकिन सवाल तो कर्ज़ बाँटने और वसूल न होने पर औने-पौने में निपटाने का है.
सवाल इसलिए भी गंभीर होता जा रहा है, क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार बनने से पहले और बनने के बाद भी बीजेपी के लोग कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सिंह सरकार पर इसी तरह अपने लोगों को फ़ायदा पहुँचाने के आरोप लगाते रहे हैं.
जबकि अब ऐसा लगने लगा है कि सरकार बदलने के बाद ऐसे मामले कम होने के बजाय काफ़ी बढ़ गए हैं.
पिछले ही महीने वित्त राज्यमंत्री ने लोकसभा को जानकारी दी कि पिछले 12 साल में बैंकों ने बड़े उद्योगों और सेवा क्षेत्र की कंपनियों के लगभग 10 लाख करोड़ रुपए के कर्ज़ राइट ऑफ़ किए या बट्टे खाते में डाले. यह आँकड़ा रिजर्व बैंक के हवाले से दिया गया है.

6 अक्तूबर 2014 को हिसार में चुनावी रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा नेता कैप्टन अभिमन्यु सिंह, हिसार से पार्टी उम्मीदवार कमला गुप्ता और ज़ी समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा.
बैंकों के डूब चुके कर्जे की सफ़ाई मोदी सरकार के दौरान अभूतपूर्व पैमाने पर हुई. आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 2014-15 से 2023-24 के बीच बैंकों ने ₹16.35 लाख करोड़ के एनपीए राइट ऑफ़ किए, जिनमें ₹9.28 लाख करोड़ बड़े उद्योगों और सर्विसेज़ से जुड़े थे.
लेकिन इन आंकड़ों को सीधे मोदी सरकार की ओर से दिए गए नए कर्ज की माफ़ी मानना ग़लत होगा- क्योंकि इनमें बड़ा हिस्सा उन कर्जों का था जो 2014 से पहले दिए जा चुके थे और जिन्हें असेट क्वॉलिटी रिव्यू और आईबीसी के बाद पहचानकर साफ़ किया गया.
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि ऐसे कर्ज़ बाँटने या डूबने का सिलसिला मोदी सरकार में ही तेज़ी से बढ़ गया हो.
दरअसल इनमें से बहुत से कर्ज़ ऐसे हैं, जो पिछली सरकार के दौरान बाँटे गए थे, लेकिन इस सरकार के दौर में पता चला कि उनकी वापसी मुश्किल है. तभी उन्हें बट्टे खाते में डाला गया.
डूबे कर्ज़ों या एनपीए के मामले में यही तर्क इस सरकार की तरफ़ से दिया जाता है कि वो तो यूपीए सरकार के किए का फल भुगत रही है. काफ़ी हद तक यह बात मानी भी जा सकती है.
यहाँ यह भी साफ़ रखना चाहिए कि बैंक के खाते में कोई कर्ज़ राइट ऑफ़ होने या बट्टे खाते में चले जाने का मतलब यह नहीं है कि देनदार की ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गई.
बैंक अपने खाते में उस कर्ज़ को ख़त्म कर देता है या डूबा मान लेता है. लेकिन वसूली की कोशिश और क़ानूनी कार्रवाई चलती रहती है. अगर पैसा वापस आ गया तो वो गड़ा ख़ज़ाना मिलने जैसा हो जाता है.
पैसा वसूलने के लिए नया क़ानून कब बना था?
लेकिन अब सवाल उठता है कि अगर मोदी सरकार ने पिछली सरकार के दौरान बाँटे गए कर्ज़ों में गड़बड़ियाँ पकड़ ली थीं या यह पाया कि देनदार भुगतान नहीं कर पा रहे हैं, तो वसूली के लिए क्या किया?
बट्टे खाते में लिखी गई इस रकम में से कितना पैसा वापस आ गया?
जवाब है कि 2016 में आईबीसी कोड बनाकर इसका इलाज निकाला गया था. बातें काफ़ी समय से चल रही थीं लेकिन यह क़ानून बना 2016 में ही.
इसमें व्यवस्था थी कि कर्ज़ न चुका पाने वाली कंपनियों को नए मालिकों को बेच दिया जाए और उनसे जितना संभव हो उतना पैसा वसूल लिया जाए.
इस काम में जो रकम वसूल नहीं हो पाती है, उसी को हेयरकट जैसा नाम दिया गया. यानी 100 रुपए के कर्ज़ में अगर 10 रुपए की वसूली न हो पाए, तो बैंक 90 रुपए से ही संतुष्ट रहेंगे और 10 रुपए को ‘हेयरकट’ कहा जाएगा.
पूरा पैसा डूबने से तो यही अच्छा.
लेकिन बात जितनी सीधी लग रही है उतनी रही नहीं. 10, 15 या 20 फ़ीसदी तक की रकम वसूल न हो पाए, तब तक तो इसे ‘हेयरकट’ कहना ठीक माना जाएगा.
लेकिन अगर 80-90 परसेंट रकम डूबने लग जाए, तब तो यह पूरा सर या पूरा धड़ काट लेने जैसा मामला हो जाएगा, फिर बचा ही क्या?
लेकिन कई मामलों में ऐसा करना भी ग़लत नहीं होता.
यूँ समझें कि आईबीसी में दीवालिया हो रही किसी कंपनी पर 10 हज़ार करोड़ रुपए का कर्ज़ है, लेकिन लेनदार नए ख़रीदार से सिर्फ़ तीन हज़ार करोड़ लेकर मामला सुलटाने पर राज़ी हो जाते हैं.
इसकी वजह यह होती है कि उन्हें डर है कि अगर ऐसा न किया, शायद हज़ार करोड़ रुपए की वसूली भी नहीं हो पाएगी.
दूसरे बड़े मामले क्या हैं
उधर ख़रीदार को लगता है कि वो इस कारोबार को अच्छे से चला सकता है. साँप भी मर गया और लाठी भी न टूटी.
उद्देश्य भी यही था कि कर्ज़ के बोझ में कारोबार बंद न हो जाए, बल्कि नया ख़रीदार ढूँढो, कंपनी भी बचाओ और जितना संभव हो उतनी रकम की वसूली भी कर लो.
यह व्यवस्था आने के बाद बहुत से मामलों में काफ़ी सफलता भी मिली. मसलन एस्सार स्टील के 57500 करोड़ रुपए के दावों में 42 हज़ार करोड़ से ज़्यादा की वसूली हो गई.
लगभग 77% यानी हेयरकट रहा 23% का. इसी तरह भूषण स्टील में 64% और जेपी में लगभग 88% की वसूली हो गई. लेकिन दूसरी तरफ़ लैन्को थर्मल जैसा मामला भी रहा, जिसमें 33331 करोड़ रुपए की लेनदारी के सामने केवल 136 करोड़ रुपए की ही वसूली हो पाई. यह 99.6% का हेयरकट था.
इसी तरह रिलायंस इन्फ्राटेल में 90%, आलोक इंडस्ट्रीज़ में 83% और एयरसेल में 81.5% तक के हेयरकट लेने पड़े.
एक और चीज़ पर ध्यान देना ज़रूरी है. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में 2014-19 के बीच बड़े उद्योगों या कारोबारों के क़रीब 3.88 लाख करोड़ रुपए के कर्ज़ बट्टे खाते में डाले गए,
जबकि मोदी 2.0 में यानी 2019-24 के बीच भी यह रकम 5.39 लाख करोड़ रुपए रही.
यानी यह कहना भी सही नहीं है कि मोदी सरकार ने यूपीए का कचरा साफ़ किया. बल्कि 2019 के बाद भी कुछ बड़े मामले सामने आए हैं. इनमें डीएचएफ़एल, फ्यूचर रिटेल और सुभाष चंद्रा जैसे मामले शामिल हैं.
सुभाष चंद्रा के मामले पर अभी स्टे लग गया है, लेकिन इस प्रक्रिया पर कुछ गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं जिनके जवाब शायद इसकी सुनवाई के दौरान मिलें. सरकार को ये भी देखना होगा कि आईबीसी नियमों में क्या कुछ बारीक जाँच परख या समीक्षा की ज़रूरत है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.




