बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में निचली अदालत की ओर से दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने आरोपी को बरी करते हुए कहा कि सिर्फ संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सका। इसलिए कोर्ट ने आरोपी को बरी करने का फैसला सुनाया।
जानिए पूरा मामला
जांजगीर-चांपा जिले के खोखसा खार के 70 वर्षीय बंशी यादव और उसके बेटे देवप्रकाश यादव के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि सितंबर 2014 में दोनों ने मिलकर लकड़ी के डंडे से मुकेश यादव पर हमला किया था। हमले में मुकेश की मौत हो गई थी। इसके बाद शव को रेलवे लाइन के पास तालाब में फेंक दिया गया था।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मुकेश की मौत का कारण सिर में चोट लगने से हुआ सदमा और ज्यादा खून बहना बताया गया था।
पुलिस की जांच और चार्जशीट के आधार पर जांजगीर-चांपा के तीसरे अपर सत्र न्यायाधीश ने 10 अप्रैल 2015 को फैसला सुनाया। कोर्ट ने बंशी यादव को दोषमुक्त कर दिया, जबकि उसके बेटे देवप्रकाश यादव को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
उम्रकैद की सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील
इस फैसले के खिलाफ देवप्रकाश ने अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला के जरिए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। हाईकोर्ट ने मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि हत्या की घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। मृतक के परिजनों ने सिर्फ यह आशंका जताई थी कि मुकेश आरोपी के घर गया था और वहां से वापस नहीं लौटा। किसी भी गवाह ने आरोपी को हत्या करते हुए नहीं देखा था।
हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ अनुमान और आशंका के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और राधाकिशन अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए देवप्रकाश को धारा 302 और 201 के आरोपों से बरी कर दिया।




