Home » छत्तीसगढ़ » झीरम घाटी हत्याकांड: लखमा के मोबाइल पर बार-बार फोन आने और गोंडी में बातचीत का जिक्र; हमले से पहले और घटना के दौरान की कई बातें सामने आई

झीरम घाटी हत्याकांड: लखमा के मोबाइल पर बार-बार फोन आने और गोंडी में बातचीत का जिक्र; हमले से पहले और घटना के दौरान की कई बातें सामने आई

रायपुर। झीरम घाटी हमले के 13 साल बाद 16 सितंबर को जगदलपुर की विशेष NIA कोर्ट ने 10 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई। इस मामले की सुनवाई के दौरान दर्ज गवाहियों में हमले से पहले और घटना के दौरान की कई घटनाक्रम की जानकारी सामने आई हैं।

कोर्ट के आदेश में दर्ज नंदकुमार पटेल के ड्राइवर दशाराम सिदार की गवाही में कवासी लखमा के मोबाइल पर बार-बार फोन आने और गोंडी में बातचीत का जिक्र है। दशाराम के बयान के मुताबिक, बातचीत के दौरान लखमा 10-15 कह रहे थे। तब नंदकुमार ने कहा कि, हिंदी में बात करो। 10-15 क्या है, पूछने पर लखमा ने इसे डीजल-डीजल बताया था।

दशाराम की गवाही के अनुसार, हमले के दौरान नक्सलियों ने नंदकुमार पटेल, दिनेश पटेल और कवासी लखमा को सड़क के किनारे बैठाया और चारों तरफ से घेर लिया। इसके बाद लखमा और नक्सली विनोद के बीच गोंडी में बातचीत हुई। करीब एक घंटे बाद नंदकुमार पटेल और दिनेश पटेल के हाथों को बांधकर उन्हें गोली मार दी गई।

हालांकि, कोर्ट के आदेश में लखमा के फोन कॉल या गोंडी में बातचीत को उनकी साजिश में भूमिका साबित करने वाला अलग निष्कर्ष नहीं बताया गया है। लखमा इस मामले में घायल गवाह के तौर पर पेश हुए थे। उनकी गवाही में उन्होंने बताया था कि नक्सलियों ने नंदकुमार पटेल, दिनेश पटेल, उनका और ड्राइवर का परिचय पूछा था। इसके बाद उन्हें और ड्राइवर को छोड़ दिया, तो दोनों बाइक से दरभा थाने आ गए।

घटना के दौरान मौके पर मौजूद ट्रक ड्राइवर की गवाही में महेंद्र कर्मा की बेहरमी से की गई हत्या का भी जिक्र है। गवाह के मुताबिक नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा को हाथ ऊपर करवाकर सड़क पर खड़ा किया और फिर जंगल की तरफ ले गए। गवाह ने दावा किया कि उसने कुछ नक्सलियों को कर्मा को पत्थर, बंदूक और लात-घूंसों से मारते देखा था।
2013 में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा रैली के दौरान नक्सलियों ने जंगल में हमला किया था। - Dainik Bhaskar
2013 में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा रैली के दौरान नक्सलियों ने जंगल में हमला किया था।

लखमा ने अपनी गवाही में क्या बताया?

कवासी लखमा इस मामले में घायल गवाह के तौर पर कोर्ट में पेश हुए थे। उन्होंने बताया कि सुकमा में दोपहर करीब 12 बजे से 2 बजे तक कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा की रैली थी। इसमें वे, नंद कुमार पटेल, अजीत जोगी, विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा समेत कई कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता मौजूद थे।

रैली खत्म होने के बाद सभी को केशलूर में सभा में शामिल होना था। खाना खाने के बाद करीब 3:25 बजे वे केशलूर के लिए रवाना हुए। झीरम घाटी के पास पहुंचने पर ऊपर की तरफ से बम फटने की आवाज आई। उनकी गाड़ी के आगे फॉलोगार्ड की गाड़ी और उसके आगे एक ट्रक फंसा था, इसलिए काफिला आगे नहीं बढ़ पा रहा था।

इसी दौरान गोली या विस्फोट के छर्रे से उनकी गाड़ी का कांच टूट गया और कांच का टुकड़ा उनके दाहिने कान में लगा। इसके बाद लखमा, नंद कुमार पटेल, उनके बेटे और ड्राइवर गाड़ी से उतरकर घाटी की तरफ जाकर छिप गए। तभी नक्सलियों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया।

लखमा के मुताबिक, नक्सली गोंडी में चिल्लाकर कह रहे थे कि वहां क्यों छिपे हो और पुलिस वाले हथियार छोड़ दें। लखमा ने भी गोंडी में जवाब दिया कि वहां कोई पुलिस वाला नहीं है, फिर बंदूक कौन छोड़ेगा।

महिला नक्सली और विनोद

लखमा ने आगे अपने बयान में बताया कि इसके बाद नक्सली चारों को पकड़कर ऊपर की तरफ ले गए। वहां मौजूद एक महिला नक्सली कह रही थी कि ऊपर से आदेश आने और विनोद दादा के कहने के बाद ही उन्हें छोड़ा जाएगा।

करीब 15-20 मिनट बाद एक नक्सली वहां आया और सबसे पहले नंद कुमार पटेल से उनका परिचय पूछा। पटेल ने बताया कि वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं। इसके बाद उनके बेटे, लखमा और ड्राइवर से भी परिचय पूछा गया।

लखमा ने बताया कि नीचे सड़क पर उनके काफिले की तरफ लगातार गोलियां चल रही थीं। करीब 15 मिनट बाद विनोद नाम का नक्सली वहां आया। उसने पूछा कि क्या वे उसे जानते हैं। जब सभी ने मना किया तो उसने अपना नाम विनोद बताया और कहा कि वहां से भागने की कोशिश न करें, वरना नक्सली उन्हें मार देंगे।

लखमा ने नक्सलियों को गोंडी में जवाब दिया कि वहां कोई पुलिस वाला नहीं है, फिर बंदूक कौन छोड़ेगा। - Dainik Bhaskar
लखमा ने नक्सलियों को गोंडी में जवाब दिया कि वहां कोई पुलिस वाला नहीं है, फिर बंदूक कौन छोड़ेगा।

लखमा और ड्राइवर को छोड़ दिया, नंद कुमार पटेल और दिनेश को नहीं

लखमा के बयान के अनुसार इसके बाद नंद कुमार पटेल ने विनोद से पूछा कि वह कौन है। इस पर विनोद नाराज हो गया और उसने एक नक्सली से कहा कि इन्हें बांध दो। इसके बाद नंद कुमार पटेल और उनके बेटे को रस्सी से बांध दिया गया। विनोद वहां से उस तरफ चला गया, जहां गोलियां चल रही थीं।

लखमा के अनुसार, करीब एक घंटे तक गोलीबारी होती रही। इसके बाद 40-50 नक्सली वहां आए और सभी को उठाकर ऊपर ले जाने लगे। करीब 10 कदम चलने के बाद उन्हें फिर बैठा दिया गया।

कुछ देर बाद नक्सलियों ने लखमा और ड्राइवर को वहां से जाने के लिए कहा। लखमा ने कहा कि वे चारों साथ जाएंगे। लेकिन नक्सलियों ने मना कर दिया और उन पर बंदूक तान दी। डर के कारण लखमा और ड्राइवर वहां से सड़क की तरफ आ गए।

सड़क पर पहुंचने के बाद उन्हें फिर गोलियां चलने की आवाज सुनाई दी। इसके बाद दोनों सड़क पर पड़ी एक मोटरसाइकिल लेकर दरभा थाने पहुंचे, जहां पहले से काफी भीड़ जमा थी।

महेंद्र ने कहा- हम सरेंडर कर रहे

झीरम की गवाहियों में महेंद्र कर्मा की हत्या का विवरण भी है। मलकीत सिंह गेंदू ने बताया कि गोलीबारी के बीच महेंद्र कर्मा ने लोगों से नीचे लेटने को कहा। बाद में जब माओवादियों ने गोलीबारी रोककर लोगों को बाहर आने के लिए कहा तो कर्मा ने अपनी पहचान बताते हुए कहा कि वे महेंद्र कर्मा हैं और गोलीबारी बंद करने की बात कही।

गवाहों के मुताबिक, माओवादियों ने उन्हें पकड़ लिया और जंगल की ओर ले गए। गवाह फूलोदेवी नेताम ने बताया कि उन्होंने गोलीबारी रोकने के लिए आवाज लगाई थी। इसके बाद कर्मा ने भी सामने आकर कहा कि वह आत्मसमर्पण कर रहे हैं। गवाह के अनुसार, माओवादियों ने कर्मा के हाथ ऊपर करवाए और उन्हें जंगल की तरफ ले गए थे। और उनकी बेरहमी से हत्या की और उनके शव के सामने नाचते रहे।

झीरम में हमले के दौरान फंसे ट्रक ड्राइवर की गवाही में महेंद्र कर्मा की बेरहमी से की गई हत्या का जिक्र है। - Dainik Bhaskar
झीरम में हमले के दौरान फंसे ट्रक ड्राइवर की गवाही में महेंद्र कर्मा की बेरहमी से की गई हत्या का जिक्र है।

ट्रक में बैठे लोगों ने भी देखा घटनाक्रम

फाल्गुन सिंह ठाकुर ने गवाही में बताया कि वह ट्रक से झीरम घाटी से गुजर रहा था। फायरिंग में ट्रक के टायर और केबिन पर गोलियां लगीं। कुछ लोगों को गोली लगी। इसके बाद नक्सली ट्रक के पास आए और पूछा कि वे पुलिस वाले हैं या नहीं। मोबाइल छीनने के बाद उन्हें जमीन पर लेटने को कहा।

गवाही के मुताबिक बाद में नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा को हाथ ऊपर करवाकर सड़क पर खड़ा किया और फिर जंगल की तरफ ले गए। गवाह ने दावा किया कि उसने कुछ नक्सलियों को कर्मा को पत्थर, बंदूक और लात-घूंसों से मारते देखा था।

नाले किनारे रिहर्सल, वायरसेट पर सूचना मिलते ही शुरू हुई फायरिंग

झीरम घाटी हमले की सुनवाई के दौरान अदालत में दर्ज बयानों में नक्सलियों की तैयारी, टीमों की तैनाती और हमले के दौरान की गई कार्रवाई का सिलसिलेवार जिक्र आया है। अभियुक्त चैतु लेकाम उर्फ मुन्ना के बयान में दावा किया गया है कि घटना से करीब एक सप्ताह पहले नक्सली टीमों ने नाले के किनारे सुबह-शाम रिहर्सल की थी। वहीं दूसरे बयान में टीसीओसी की बैठक में अलग-अलग इलाकों की जिम्मेदारी बांटे जाने की बात सामने आई है।

टीसीओसी बैठक में बांटी गई थी जिम्मेदारी

बयान के मुताबिक झीरम घटना से पहले टीसीओसी की बैठक हुई थी। इसमें देवजी, श्याम, रमेश, वेंकटेश, मेनक्का, माधवी, हिड़मा और सुरेंदर समेत अन्य लोग शामिल हुए थे। बैठक में भर्ती, ट्रेनिंग, हमला, एजुकेशन डिप्लॉयमेंट और दक्षिण क्षेत्र की जिम्मेदारियों पर चर्चा हुई।

गांव वालों को चावल लेकर मीटिंग में बुलाने का बयान

रामू बघेल के बयान में भी नक्सलियों की गतिविधियों और ग्रामीणों को उनके लिए काम करने के लिए बुलाने का जिक्र है। उसने बताया कि उसके गांव में सोनाधर, विनोद, सुमित्रा, फूलो और लक्ष्मण ने बैठक लेकर चावल और पैसे की मांग की थी। इसके बाद गांव से चावल लेकर लोग कांदानार में महादेव के पास पहुंचे। फिर उन्हें भडरीमडु की बैठक में वही चावल लेकर आने को कहा गया।

रामू के मुताबिक जंगल में सोनाधर, विनोद, डोकरा, लक्ष्मण, कांदानार का महादेव और चांदामेटा का बोटी मौजूद थे। बाद में उसे और दूसरे ग्रामीणों को एलंगनार के पहले रोककर खाना बनाने के लिए कहा गया। नक्सली सड़क की ओर चले गए।

कर्मा के शरीर पर कम से कम 69 घाव दर्ज किए गए

कोर्ट के आदेश में दर्ज पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, महेंद्र कर्मा के शरीर पर कई गंभीर चोटें थीं। सिर पर धारदार हथियार के घाव, शरीर पर चाकू के घाव, चेहरे पर चोट, पसलियों और अंदरूनी अंगों को नुकसान और पीठ में गोली लगने के निशान मिले।

पोस्टमॉर्टम में दोनों गोली के घाव पीठ की तरफ बताए गए। गोली लगने से पसलियों और फेफड़ों को नुकसान हुआ था। इसके अलावा शरीर के कई हिस्सों में धारदार हथियार और दूसरी चोटों के निशान थे।।

पोस्टमॉर्टम में कर्मा के शरीर पर कम से कम 69 घाव दर्ज किए गए थे। गवाह ने यह भी बताया कि माओवादियों ने कर्मा को मारने के बाद उनके शव पर चाकू से वार किए और उनके आसपास नारे लगाए।

नंदकुमार पटेल को 2 गोलियां मारी गई थी

तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में दो गोली के घाव मिले। एक गोली बाएं कंधे की तरफ से लगी और अंदर जाकर पसलियों, फेफड़े और दिल के आसपास के हिस्से को नुकसान पहुंचा।

दूसरी गोली बाएं पेट की तरफ लगी और अंदर आंत, पेट और लीवर तक पहुंची थी। रिपोर्ट में मौत का कारण गोली लगने से हुए शॉक और अधिक रक्तस्राव को बताया गया था।

दिनेश पटेल को सिर पर धारदार हथियार और पीठ में गोली

नंदकुमार पटेल के बेटे दिनेश पटेल की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सिर पर कई धारदार हथियार के घाव मिले थे। सिर की हड्डी टूटने और मस्तिष्क को गंभीर नुकसान का जिक्र है। इसके अलावा पीठ में गोली का घाव था, जिससे पसली और दायां फेफड़ा प्रभावित हुआ था। जांघ पर भी चाकू से चोट के निशान मिले। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक, सिर और गोली की चोटें मौत के लिए पर्याप्त थीं।

गाड़ियों पर 206 गोलियों के निशान

जांच में वाहनों पर करीब 206 गोलियों के निशान मिलने की बात भी कोर्ट के आदेश की रिपोर्टिंग में सामने आई है। हमले में बड़ी संख्या में हथियार भी लूटे गए थे, जिनमें AK-47, INSAS, 9 एमएम पिस्टल और SLR शामिल थे।

इसमें तय किया गया कि किस इलाके में कौन-सी कंपनी जाएगी। वेंकटेश को गंगालूर और श्याम व सुरेंदर को दरभा डिविजन की जिम्मेदारी दी गई। दरभा डिविजन में सीआरसी की प्लाटून, कंपनी-02 के दो सेक्शन और दरभा डिविजन के लोगों को मिलाकर हमले के लिए टीम बनाई गई।

इसकी जिम्मेदारी सुरेंदर, जयलाल, देवा, विनोद और श्याम को दी गई थी। हालांकि, जिस साक्षी ने यह जानकारी दी, उसने प्रतिपरीक्षण में स्वीकार किया कि वह झीरम घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं था।

पीडिया के जंगल से दरभा घाटी तक पहुंचे

अभियुक्त चैतु लेकाम उर्फ मुन्ना के बयान के अनुसार, मई 2013 के पहले सप्ताह में नक्सली पीडिया के जंगल में मौजूद थे। वहां प्लाटून कमांडर हेमला मासा ने बताया कि गणेश अन्ना के कहने पर सभी को दरभा घाटी जाना है।

चैतु के मुताबिक वह अपनी इंसास राइफल के साथ, ज्योति प्रमिला 12 बोर बंदूक और हेमला मासा एके-47 लेकर निकले। रीता तेलाम के पास हैंड ग्रेनेड था। अन्य लोग भी अपने हथियारों के साथ पीडिया से निकले और गम्पुर पहुंचे।

वहां जयलाल कंपनी कमांडर दक्षिण बस्तर की दो प्लाटून लेकर आया, जिनमें महिला और पुरुष दोनों शामिल थे। इसके बाद टीम डेंगुर, पालनार, गरियुम, ताड़बोड़ा होते हुए कुसुम गांव पहुंची। यहां ओडिशा और दरभा घाटी की नक्सली पार्टी के करीब 150 लोग मौजूद थे।

Facebook
X
WhatsApp
Telegram