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बस्तर दशहरा: ग्रामीणों ने विजय रथ चुराकर निभाई भीतर रैनी रस्म, रथ के पहिए के नीचे आने से ग्रामीण की मौत

जगदलपुर। बस्तर दशहरा में 21 अक्टूबर की रात रथ चुराकर भीतर रैनी की रस्म निभाई गई। माता दंतेश्वरी के छत्र के साथ 8 चक्कों वाले दो मंजिला विजय रथ की परिक्रमा कराई गई। इस दौरान रथ के चक्के के नीचे आने से एक ग्रामीण की मौत हो गई।

परिक्रमा पूरी होने के बाद माता दंतेश्वरी का छत्र रथ से उतारा गया। इसके बाद किलेपाल क्षेत्र से पहुंचे माड़िया जनजाति के ग्रामीणों ने परंपरा के अनुसार रथ को अपने कब्जे में लिया। वे रथ को खींचकर जगदलपुर शहर से करीब 3 किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट के जंगल में ले गए और वहां छिपा दिया।

विजय रथ की परिक्रमा देखने के लिए हजारों लोग जुटे थे। बस्तर दशहरा में भीतर रैनी और बाहर रैनी की रस्में ग्रामीणों और राज परिवार के बीच लंबे समय से चली आ रही परंपरा का हिस्सा हैं।

22 अक्टूबर को बस्तर राज परिवार के सदस्य कुम्हड़ाकोट पहुंचेंगे। यहां ग्रामीणों के साथ नवाखाई की रस्म निभाई जाएगी। इसके बाद विजय रथ को वापस जगदलपुर लाया जाएगा। इस परंपरा को बाहर रैनी कहा जाता है।

देखिए ये तस्वीरें…

माता दंतेश्वरी के छत्र के साथ विजय रथ की परिक्रमा कराई गई। - Dainik Bhaskar
माता दंतेश्वरी के छत्र के साथ विजय रथ की परिक्रमा कराई गई।
55 गांवों के माड़िया समुदाय के लोग परंपरा निभाते हैं। - Dainik Bhaskar
55 गांवों के माड़िया समुदाय के लोग परंपरा निभाते हैं।
विजय रथ की परिक्रमा देखने के लिए हजारों लोग जुटे थे। - Dainik Bhaskar
विजय रथ की परिक्रमा देखने के लिए हजारों लोग जुटे थे।

55 गांवों के माड़िया समुदाय के लोग निभाते हैं परंपरा

भीतर रैनी की रस्म में किलेपाल, बास्तानार सहित करीब 55 गांवों के माड़िया समुदाय के लोग शामिल होते हैं। ग्रामीण विजय रथ को कुम्हड़ाकोट के जंगल में ले जाकर छिपाते हैं। अगले दिन बस्तर राज परिवार के सदस्य वहां पहुंचते हैं। ग्रामीणों के साथ नवाखाई की रस्म निभाने के बाद विजय रथ को वापस जगदलपुर लाया जाता है।

बस्तर राज परिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव के मुताबिक, इस परंपरा में राजा को हाथी-घोड़ों और राजसी ठाठ के साथ कुम्हड़ाकोट बुलाया जाता है। यहां ग्रामीणों के साथ नवाखाई की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद ग्रामीण सम्मान के साथ विजय रथ को खींचकर राजमहल तक लाते हैं। इस दौरान राजा रथ के आगे चलते हैं, जबकि ग्रामीण पीछे से रथ खींचते हैं।

रथ का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। - Dainik Bhaskar
रथ का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया।

राजा को सचेत रहने का संदेश देने से जुड़ी है मान्यता

फिल्म डायरेक्टर और बस्तर दशहरा के जानकार अविनाश प्रसाद के मुताबिक, भीतर रैनी की परंपरा को लेकर मान्यता है कि राजशाही के समय माड़िया जनजाति के लोगों ने राजा को सचेत रहने का संदेश देने के लिए विजय रथ अपने कब्जे में ले लिया था। इसके बाद से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है।

बस्तर दशहरा में रथ चलाने की परंपरा 600 साल से ज्यादा पुरानी मानी जाती है। बताया जाता है कि तत्कालीन महाराजा पुरुषोत्तम देव दंडवत यात्रा करते हुए जगन्नाथ पुरी पहुंचे थे। वहां उन्हें रथपति की उपाधि मिली थी। इसके बाद बस्तर दशहरा में रथ चलाने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी जारी है।

परंपरा में राजा को हाथी-घोड़ों और राजसी ठाठ के साथ कुम्हड़ाकोट बुलाया जाता है। - Dainik Bhaskar
परंपरा में राजा को हाथी-घोड़ों और राजसी ठाठ के साथ कुम्हड़ाकोट बुलाया जाता है।

5 दिन निकलता है फूल रथ, विजयादशमी पर चलता है विजय रथ

बस्तर दशहरा में अलग-अलग दिनों पर दो रथों की परिक्रमा कराई जाती है। नवरात्रि की तृतीया से सप्तमी तक 4 चक्कों वाले फूल रथ की परिक्रमा होती है। वहीं, विजयादशमी पर 8 चक्कों वाले दो मंजिला विजय रथ को निकाला जाता है। भीतर रैनी और बाहर रैनी की रस्में इसी विजय रथ से जुड़ी हैं।

विजय रथ की चपेट में आने से ग्रामीण की मौत हो गई। - Dainik Bhaskar
विजय रथ की चपेट में आने से ग्रामीण की मौत हो गई।

विजय रथ की चपेट में आने से ग्रामीण की मौत

बस्तर दशहरा में विजय रथ की परिक्रमा के दौरान एक ग्रामीण रथ के पहिए के नीचे आ गया। कुचलने से उसकी मौके पर ही मौत हो गई। हादसे में एक अन्य ग्रामीण भी रथ की चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हो गया।

घटना के बाद कुछ समय के लिए रथ की परिक्रमा में देरी हुई। पुलिस ने मृतक के शव को अस्पताल पहुंचाया। बताया जा रहा है कि मृतक विजय रथ खींचने के लिए आया था। खबर लिखे जाने तक मृतक और घायल ग्रामीण के नाम की जानकारी नहीं मिल पाई थी।

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