नई दिल्ली। दिल्ली में 20 जुलाई को हुए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) विरोध प्रदर्शन के आयोजकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट सहमत हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि भले ही कुछ गुमराह लोगों ने पत्थरबाजी की हो लेकिन युवाओं को शांत करने की जरूरत है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार का कोई भी आक्रामक रवैया स्थिति को और खराब कर सकता है और हिंसा को और बढ़ा सकता है।
याचिकाकर्ता ने दी चेतावनी
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिकाकर्ता ने चेतावनी दी कि कल जेनरेशन अल्फा, बीटा और डेल्टा आएंगे। उन्होंने जेन जी छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आपराधिक मामले वापस लेने के किसी भी राजनीतिक फैसले का विरोध करते हुए कहा कि ऐसा करने से भविष्य के आंदोलनों के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम होगी।
इस याचिका में केंद्र सरकार और राज्यों को हालिया छात्र प्रदर्शनों से जुड़े दंगे के मामलों को केवल किसी राजनीतिक समझौते के आधार पर वापस लेने से रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की गई है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने इस मामले को छात्रों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े दूसरे मामलों के साथ जोड़ा। इन मामलों में कोर्ट ने 3 अगस्त को साफ किया था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस ली जा सकती हैं।
मनीष कुमार सोलंकी की ओर से दायर याचिका में विरोध प्रदर्शन के आयोजकों की जवाबदेही तय करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील रिजवान अहमद ने कहा, “यह (विरोध प्रदर्शन) मंत्री और पुलिस की जवाबदेही के बारे में था। हम यह मानते हैं। 15 दिन बीत चुके हैं। आयोजकों की जवाबदेही का क्या? वे एक चैनल से दूसरे चैनल पर जाकर भड़काऊ बयान दे रहे हैं और आग बुझाने से इनकार कर रहे हैं।”
‘इसमें सीजेपी की जवाबदेही कहां है’
उन्होंने कहा, “तथाकथित आयोजकों की जवाबदेही कहां है? मैं तथाकथित आयोजक इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यह कोई रजिस्टर्ड संगठन नहीं है।” उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी की ओर इशारा करते हुए यह बात कही, जिसने नीट 2026 पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था।
अहमद ने कहा कि कानून के तहत किसी सभा के दौरान होने वाली किसी भी अप्रिय घटना के लिए आयोजकों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। अहमद ने कहा कि सरकार ने प्रदर्शनकारियों की केस वापस लेने की मांग मान ली है और चेतावनी दी कि इससे एक खतरनाक मिसाल कायम होगी।
उन्होंने कहा, “कल राजस्थान में कानून-व्यवस्था से जुड़ी एक घटना हुई, जिसमें एक युवक की मौत हो गई। सवाल यह है कि अगर सरकार राष्ट्रीय राजधानी के मामले में छात्रों की बात मानने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है तो क्या वह राजस्थान के लिए भी ऐसी ही मिसाल कायम करेगी? क्या वहां भी सरकार छात्रों की मांगों को पूरा करने के लिए पूरी कोशिश करेगी?”
सीजेआई ने क्या कहा?
चीफ जस्टिस ने कहा कि ताकतवर सरकार की तरफ से सख्ती दिखाने से हालात और बिगड़ सकते हैं और उन्होंने अंदाजा लगाया कि शायद इसी सोच के साथ केस वापस लेने का फैसला किया गया होगा।
सीजेआई ने कहा, “ये युवा हैं। इन्हें बहुत ज्यादा सलाह और मार्गदर्शन की जरूरत है। ताकतवर सरकार की तरफ से कोई भी आक्रामक रवैया हालात को बेवजह बिगाड़ सकता है और इससे और हिंसा भड़क सकती है। इससे बचना चाहिए।”
‘पत्थरबाजों को बिना सजा के नहीं छोड़ा जा सकता’
अहमद ने साफ किया कि वह कोई सख्त आपराधिक सजा नहीं चाहते थे बल्कि गाली-गलौज वाले नारे लगाने वाले नाबालिगों के लिए कम्युनिटी सर्विस (समाज सेवा) की सजा का प्रस्ताव रख रहे थे। साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा, “सिर्फ इसलिए कि सरकार मुश्किल स्थिति में फंस गई थी, पत्थरबाजों को बिना सजा के नहीं छोड़ा जा सकता।”
उन्होंने कहा कि ऐसी हरकतों को नजरअंदाज करने से दूसरे ग्रुप भी संसद के सामने इसी तरह के प्रदर्शन करने के लिए बढ़ावा महसूस करेंगे।
उन्होंने आगे कहा, “किसान शंभू बॉर्डर पर थे। कल जेनरेशन अल्फा, बीटा, डेल्टा आएगी। क्या कल शंभू बॉर्डर पर मौजूद लोग ट्रैक्टर लेकर संसद आएंगे? कल शाहीन बाग के लोग संसद आएंगे। अगर 500 लोग संसद में घुस जाते तो कौन जानता है कि उनके पास देसी बंदूक या देसी बम नहीं होता? संसद की सुरक्षा व्यवस्था 500 लोगों को संभालने के लिए नहीं बनी है। यह एक बहुत ही आधुनिक सुरक्षा बल है, वे गोली चला देते। तब क्या होता?”
‘बहुत ही सावधानी से काम लेना होगा’
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि इस स्थिति को सावधानी से संभालने की जरूरत है और युवाओं को काउंसलिंग और इस बात का भरोसा दिलाने की जरूरत है कि उनकी बात सुनी जा रही है।
सीजेआई ने कहा, “अगर कोई घटना होती है तो पुलिस को बहुत संयम बरतना होगा ताकि स्थिति हाथ से न निकले। हमें बहुत सावधानी से काम लेना होगा ताकि युवा हिंसा न करें। बेहतर तरीका यह है कि उन्हें समझाया-बुझाया जाए और शांत किया जाए कि बात सुनने से ही सबसे बड़ी ताकत मिलती है।”
याचिका में क्या मांग की गई?
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इसमें उन लोगों की पहचान करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई है, जिन्होंने कथित तौर पर जुलाई 2026 में हुए विरोध प्रदर्शनों और मार्च के दौरान पुलिस और सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ अपमानजनक या मानहानि वाली भाषा का इस्तेमाल किया था। साथ ही यह भी मांग की गई है कि उन्हें निगरानी में सामुदायिक सेवा करने का आदेश दिया जाए।
याचिका में केंद्र सरकार और अन्य अधिकारियों से यह निर्देश देने की मांग की गई है कि वे कानून की उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए वीडियो रिकॉर्डिंग, तस्वीरों और अन्य विश्वसनीय सबूतों के आधार पर ऐसे सभी लोगों की पहचान करें, चाहे वे नाबालिग हों या वयस्क।
इसमें यह भी गुजारिश की गई है कि जिन लोगों की पहचान की गई है, उन्हें उचित निगरानी में कम्युनिटी सर्विस करने का निर्देश दिया जाए। इसमें पूजा-स्थलों या अन्य सार्वजनिक जगहों पर साफ-सफाई का काम शामिल हो सकता है। यह निर्देश उन पर कानून के तहत शुरू की जा सकने वाली किसी भी आपराधिक कार्रवाई पर असर डाले बिना दिया जाए।




